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हाथरस

1 नवंबर को अंबेडकर ऑडिटोरियम में पुस्तक का विमोचन होगा । जितेंद्र शर्मा फौजी होंगे कार्यक्रम में शामिल
337 दिन
इंटरनेशनल गुडविल सोसाइटीज" "ऑफ़ इंडिया: के 01 नवंबर को अंबेडकर ऑडिटोरियम में होने वाली बैठक मे इस पुस्तक का विमोचन किया जाएगा। जिसमें इंटरनेशनल गुडविल सोसाइटीज के सदस्यों से "भारतवर्ष में न्यायिक प्रतिक्रिया" मैं बदलाव की आवश्यकता है। "सुझाव" मांगे गए हैं। जिसमें हाथरस के नवल नगर निवासी जितेंद्र शर्मा फौजी ने निम्न सुझाव भेजे हैं तथा कार्यक्रम के दौरान वह स्वयं भी मौजूद रहेंगे । "भारतवर्ष" की "न्यायिक प्रतिक्रिया" में बदलाव की "आवश्यकता" है। भारत की “न्यायिक” “प्रतिक्रिया” में सुधार के लिए “न्यायाधीशों” की “संख्या” बढ़ाना, अबीदालतो का “डिजिटलीकरण” और “प्रौद्योगिकी” का उपयोग करना। “वैकल्पिक विवाद” समाधान (ADR) जैसे मध्यस्थता और सुलह को बढ़ावा देना, “न्यायाधीशों” और “कर्मचारियों” का गहन “प्रशिक्षण” की व्यवस्था करना, “जनहित याचिका” जैसी कानूनी सहायता “प्रणालियों” को मजबूत करना, और “न्यायिक प्रशासन” की “पारदर्शिता” व “उत्तरदायित्व” बढ़ाना अति “आवश्यक” है। 1. “वैकल्पिक विवाद” “समाधान” “वैकल्पिक विवाद” “समाधान” (ADR): अदालत के बाहर विवादों के सुलझाने का एक तरीका है। इसमें मध्यस्थता और “पंचायतीय” जैसी “प्रक्रियाएं” शामिल हैं, जहाँ एक “तटस्थ” पक्ष-पक्षों को आपसी “सहमति” से “समाधान” तक पहुँचने में मदद करता है। “ADR” पारंपरिक मुकदमों की तुलना में कम खर्चीला, “तेज” और “कम” तनावपूर्ण हो सकता है। 2. जनहित याचिका (PIL) “जनहित याचिका” (PIL): जैसी कानूनी सहायता “प्रणालियों” को मजबूत करना अति “आवश्यक” है। इन सुधारों से “न्याय” मिलने का लगने वाला समय कम किया जा सकता है, ताकि सभी वर्गों को “न्याय” प्राप्त हो सके, और विशेष तौर पर वे लोग जो “कानूनी फीस” वहन नहीं कर सकते, उन्हें भी सहायता मिल सके। 3. न्याय प्रणाली “न्याय प्रणाली”: में अंग्रेज़ी के बजाय प्रांतीय भाषाओं में कार्य किए जाने की मांग बहुत दिनों से चली आ रही है। ताकि आम जन-मानस अपनी बात कह सके और सुन सके। 4. “न्यायाधीशों” की संख्या “व” कार्य प्रणाली” “न्यायाधीशों” की संख्या “व” कार्य प्रणाली” में सुधार: न्यायाधीशों की नियुक्ति 10 लाख की जनसंख्या पर न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या को “विधि आयोग” की “सिफारिश” के अनुसार बढ़ाना चाहिए ताकि “लंबे मामलों” में “विलम्ब” को कम किया जा सके। 5. “कार्य दिवस” “कार्य दिवसों” में वृद्धि: अदालतों को सप्ताह में भरपूर खुला रखना चाहिए जिसमें “शक्तिपूर्ण” और “सक्षमतापूर्ण” अदालती कार्य हो सके। “कार्य दिवसों” को बढ़ाया जाना चाहिए। विशेष अदालतें: उन राज्यों में जहाँ मुकदमों की संख्या अधिक है, विशेष अदालतों का गठन किया जाना चाहिए। 6. “न्यायपालिका की स्वतंत्रता” “न्यायपालिका की स्वतंत्रता”: “चयन” और “नियुक्ति” के आधार पर “न्यायाधीशों” का “चयन” करके और उनकी नियुक्ति में “पारदर्शिता” एवं “अनुशासित निर्णयों” से सशक्त “न्यायपालिका की स्वतंत्रता” को सुनिश्चित किया जाना चाहिए।